Sunday, June 3, 2007


ord Shri Krishna has given the total knowledge of life and enlightenment to mankind through Shri Bhagvad Geeta. As the eight incarnation of Lord Vishnu, he embodies the supreme administering power of the universe. The Itihas and Puran of the Vedic Literature provide an eternal record of the divine life of Shri Krishna, revealing how his every thought, word and action serve to eliminate negativity, promote evolution and restore Dharma in world consciousness. Shri Krishna govind hare murare he nath narayan vasudeva is one of the most revered shlokas sung by devotees of Lord Krishna throughout the world. This shloka is sung as a bhajan in various traditional tunes or compositions.
Listening to this bhajan in praise of Lord Krishna fills the heart with bliss, balances the nervous system and brings peace and contentment to the mind.
The most familiar traditional composition is used for this recording. This recording may be played at any time of the day or night and on any day of the week.

Saturday, June 2, 2007

मधुशाला

मधुशाला

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े पिरवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मज्ञल्तऌा समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मज्ञल्तऌा होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्िदर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हिर मंिदरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमंे माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ -अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निरंिचत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधँु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दूखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंितम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंितम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालांे को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंिडत अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँखिमचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-िमलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तिनक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिहवा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाय जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तिनक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँित भाँित का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हँू, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंिबत करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंिबत-प्रतिबंिबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहँा गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उज्ञल्तऌार पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंिडत जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छूू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिहवा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुिच थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं किव का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
किलत कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

पिरिशष्ट से

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहज्ञल्तऌार प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।

- बच्चन

* * *

बेताल कथा

बेताल कथा

—अंशुमान अवस्थी


हर सफ़र की एक कहानी होती है और उस कहानी की एक शुरुआत भी, पर ज़िंदगी के सफ़र की कहानी की शुरुआत कहाँ से की जाय क्यों कि आमतौर पर उसकी तो शुरुआत ही गुम होती है। यह एक गंभीर समस्या है। हमने तो जब से होश सँभाला है अपने को सफ़र में ही पाया है। ख़ैर छोड़िए शुरुआत को, अब तो बस आप अंत का सोचिए। वैसे भी जब कोई कहानी शुरू होती है तो ख़त्म भी। पर ज़िंदगी की कहानी, अरे साहब इसमें तो इतने क्रमश: लगे होते हैं कि...अब हम आपको क्या बताएं... ख़ैर परेशान होने की बात नहीं है इस कहानी का अंत आपको इन्हीं पृष्ठों में कहीं न कहीं मिल ही जाएगा और यदि यहाँ नहीं तो कहीं और सही... कभी और सही।

कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पर अपना परिचय देने से पहले व कहानी शुरू करने से पहले हम अपने खानदान वगैरह के बारे में बता दें ताकि पाठकों को ये मालूम हो जाए कि हम किस विरासत के मालिक है और परंपराओं में हमारा कितना विश्वास है।

हमारे दादा जी, सारे गाँव में शास्त्री जी के नाम से मशहूर थे पर शास्त्रों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। कहते थे कि शिक्षा व्यक्तित्व की दुश्मन होती है। उनका मानना था कि यदि हमारे पूर्वज वानर थे और मनुष्य का विकास उन्हीं से हुआ है तो अब इस विकास को क्या हो गया है, ज़ाहिर है जिस दिन से मनुष्य ने अध्ययन आदि करना शुरू किया उसका विकास रुक गया है। मानव जीवन में शिक्षा एक कृत्रिम आवश्यकता है और यही वजह है कि प्रकृति में कोई भी 'चेतन' (सिवाय मनुष्य के) इस दिशा में नहीं सोचता है। आख़िर शेर को शेर की तरह व्यवहार करने में कितनी पुस्तकों की सहायता होती है। जब तक वो जीवित रहे अपने सद्धांतों पर अडिग रहे। कहते थे कि कलम बंदूक से भी ख़तरनाक हथियार है इसलिए कभी हाथ मत लगाना।

अपने इन्हीं सद्धांतों की बदौलत हमारे दादाजी सांसद बनकर संसद तक घूम आए और ढाई साल बाद जब वो मध्यावधि चुनावों को कोसते हुए संसद से गाँव वापस आए तो इस अखंड विश्वास के साथ कि मनुष्य को वास्तव में किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं है (हमें नहीं लगता कि पाठकों को अपनी संसद के परिचय की तनिक भी आवश्यकता है)। उनके इन तर्कों को गाँव से लेकर दिल्ली तक, कभी कोई काट नहीं पाया।

देखिए बात कहाँ शुरू हुई थी और कहाँ मुड़ गई। भला परंपरा और संसद का भी कोई संबंध है। वहाँ तो प्रतिदिन नई परंपराएँ पड़ती हैं और अगले दिन टूट जाती हैं। तो हम बात कर रहे थे अपने दादाजी व उनके मानव जीवन तथा शिक्षा के प्रति अति विशिष्ट दृष्टिकोण की। अब जैसा कि हर युग हर परिवार में होता आया है, कोई न कोई विद्रोही प्रकृति का निकल ही आता है।

यही हाल था हमारे पिताजी का। यह तो पता नहीं की शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण क्या है क्योंकि उस विषय पर हमारी उनसे कभी बात नहीं हुई पर सुनने में आता है कि पढ़ाई लिखाई में उनकी रुचि कभी नहीं रही। अब चूँकि सुनने सुनाने पर ही हम भारतीयों का पूरा इतिहास क्या, पूरा का पूरा अस्तित्व ही आधारित है इसलिए अविश्वास की गुंजाइश रह नहीं जाती।

इतिहास की बात से याद आया कि न तो मैक्सम्युलर ने तब कोई छेड़खानी की होती और न ही अँग्रेजों ने बाद में कोई शैतानी तो यह दक्षिणपंथी ­ वामपंथी इतिहास का कोई झगड़ा भी न होता और न ही कुछ प्रतिशत पढ़े-लिखे लोगों को फालतू की मगज़मारी ही करनी पड़ती कि सभ्यता का विकास गंगोत्री से गंगासागर की तरफ़ हुआ है या फिर गंगासागर से गंगोत्री की ओर।

देखिए बात फिर मुड़ गई। अब क्या करें अपनी फितरत ही कुछ ऐसी है, हाँ तो पढ़ाई हमारे पिताजी ने अवश्य की। पढ़ाई उन्होंने हमारे दादाजी के ख़िलाफ़ विद्रोह की दुंदुभी बजाकर की जैसा कि आजकल हर टीनएजर करने पर तुला हुआ है। पर आजकल तो सब विद्रोह कर रहे हैं पढ़ाई कोई नहीं कर रहा। जब तक हमारे पिताजी ने बारहवीं पास नहीं कर ली हमारे दादाजी कुढ़ते रहे, जब उन्हें किसी तरह से विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला तब दादाजी को यह सोच कर चैन आया कि अब तो उनका पुत्र नेतागीरी करके सारे खानदान का नाम रोशन करेगा। वैसे भी विश्वविद्यालयों से आजकल किसी को नौकरी की गारंटी भले न मिलती हो पर नेतागीरी जैसे फलते फूलते व्यवसाय में हाथ पैर मारने के लिए काफ़ी अनुभव मिल ही जाता है। पर नेतागीरी हमारे पिताजी ने की नहीं यद्यपि उन्हें बातें बनाने में महारत हासिल है, फिर भी...।

अब आप ये बताइए इस देश में बातें बनाने में किसे महारत हासिल नहीं है। राह चलते आपको ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हर विषय के साथ-साथ बातें करने में भी विशेषज्ञ होंगे। राजनीति और समाजशास्त्र से लेकर स्टिंग थ्योरी तक में उनका दखल होगा। पाठकों को लग रहा होगा कि हम विषय से भटक जाते हैं। क्या करें विषय से भटकने की परंपरा का निर्वाह जो करना है। सारे देश का यही हाल है, नेतागण यदि विषय से भटके हुए हैं तो आम जनता भी उनसे पीछे कहाँ है। वैसे तो आम जनता को तो पता ही नहीं है कि विषय क्या है और जानकर भी क्या करना है।

मज़ेदार बात यह है कि भटक कर भी लोग अपनी परंपराओं को नहीं भूले हैं और किसी न किसी तरीके से कोई न कोई परंपरा वेताल की तरह अपने कंधे पर लादे लिए जा रहे हैं। कोई उनसे पूछे कि भाई विक्रमादित्य बनने में मज़ा आता है क्या, पर सवाल यह है कि पूछे कौन। सभी तो विक्रमादित्य बनने में व्यस्त हैं। लखनऊ के नवाब साहब एक भूलभुलैया बनवाकर एक अनोखी परंपरा क्या छोड़ गए, सारा का सारा देश ही भूलभुलैया बना हुआ है।

अब जब परंपरा पालन की बात चल ही निकली है तो लगे हाथों क्यों न गांधी परंपरा का भी ज़िक्र कर लें। यह तो पता नहीं कि गांधी परंपरा का निर्वाह कितने और कौन लोग कर रहे हैं पर गांधी जी के बंदरों के भक्त बहुत मिल जाएँगे ­ बुरा कहने वाले को कुछ न कहो और वैसे भी आजकल भला कोई कुछ कहता है, यदि कहीं कुछ बुरा हो रहा है तो आँख मूँद लो और यदि कोई किसी को बुरा (भला) कह रहा है तो अनसुनी कर दो।

तो यह था थोड़ा परिचय हमारे खानदान, विरासत व परंपराओं के बारे में और अब हम अपनी कहानी वहाँ से शुरू करते हैं जहाँ पर छोड़ी थी। हम बचपन से काफ़ी रचनात्मक थे और रचनात्मक अभिव्यक्ति में हमारा काफ़ी विश्वास था क्योंकि सिर्फ़ रचनात्मक होना ही काफ़ी नहीं होता। हमारी पहली रचना गूढ़ विचारों के रूप में तब सामने आई जब हमने उन्हें घर की सफ़ेद दीवारों पर काफ़ी दार्शनिक अंदाज़ में व्यक्त किया था। अलग व्यक्तित्व पर उनका प्रभाव कुछ अलग ढंग से पड़ा था। माँ हमारी रचनात्मकता से अभिभूत होकर भावविभोर हो गईं थीं, पिताजी ने मुसकुराकर कहा था चिंता मत करो, बड़ा होकर जब समझदार बनेगा तब यह हम जैसों की तरह ही इस समाज में घुलमिल कर उसी का एक हिस्सा हो जाएगा। हमारे दादाजी, उन्हें तो काफ़ी सदमा लगा था और तुरंत ही उन्होंने ज्योतिषी को बुलवा भेजा था।

ज्योतिषी के अनुसार हमारे जन्म के समय नक्षत्रों की स्थिति कुछ वैसी ही थी जैसी कि भक्त तुलसीदास के लिए, पर बच्चे की फितरत कबीरदास जैसी होगी, कुल मिलाकर परेशान होने जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन हमारे दादाजी को चैन कहाँ, उन्होंने तो घर पर अखंड रामायण बिठवा दी ताकि हमारे ऊपर से बुरे ग्रहों का साया उठ जाय। अगले ही दिन उस सफ़ेद दीवार पर हमारी कलाकृति की जगह उन टोटकों ने ले ली थी जो हमारे भले के लिए डाले गए थे। कभी-कभी हम सोचते हैं कि गुफ़ाओं में बने वो पाषाणकालीन चित्र कहीं टोटके ही तो नहीं जिसे हमारे तथाकथित सभ्य समाज ने कला का नाम दे दिया है और उनके छायाचित्र अपने ड्राइंगरूम में लटकाकर ड्राइंगरूम को एथनिक टच देने में लगे रहते हैं।

°°°

बात उस समय की है जब हमने क़रीब दो­ढाई सौ पन्ने जमा कर लिए थे अपनी कविताओं के, बस समस्या यही थी कि मूल्यांकन किससे करवाया जाय। एक दिन बातों बातों में हमने अपनी इस समस्या का ज़िक्र मित्र हनुमान से किया तो वह फट से फूट पड़ा, ''एक बात मानो गुरू., तुम पंडित जी के पास चले जाओ।''
''कौन वो मांटेसरी वाले,'' हमने पूछा।
''हाँ वही याद नहीं है पिछले साल रामलीला के टाइम खूब कविता बोले थे और खूब तालियाँ पाए थे, कविता वो लिखें और झेले सारा गाँव।''

हनुमान ने चुटकी ली और चलता बना पर हमें अवश्य सोच में डाल गया। वास्तव में क्या तालियाँ बजाई थी श्रोताओं ने उनके काव्यपाठ के दौरान। उनकी हर कविता के बाद पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट गूँज जाता इस आशा से कि ये अंतिम होगी पर पंडित जी तालियों की गर्जना से प्रेरित हो सावन भादों की झड़ी की तरह एक नई कविता शुरू कर देते। हद तो तब हो गई जब उनकी एक कविता के दौरान श्रोता सारे समय ताली ही बजाते रहे, यह धुन निकालते रहे 'और नहीं अब और नहीं' और उस कविता को अंतिम बनाकर ही छोड़ा। पंडित जी को भी लगा कि तालियों की निरंतर गड़गड़ाहट ही उनकी कविताओं को सच्ची श्रद्धांजलि है, तभी जाकर वो रुके।

ख़ैर अब कोई और चारा भी हमारे पास न था। पंडित जी के पास तो जाना ही था। काफ़ी हिम्मत जुटाई, जुटानी क्या थी हनुमान ने दिलाई। पन्ने सँभाले और एक दोपहर पहुँच गए पंडितजी के घर। सबसे पहले पंडितजी के पालतू कुत्ते ने सूँघकर, दुम हिलाकर और फिर अपने दो पैर हमारे ऊपर टिकाते हुए, हमारा मुँह चाटकर स्वागत किया ओर हमें बैठक की ओर ले गया। पंडितजी ध्यानमग्न होकर अपनी उँगलियों से नाक के बालों से खेल रहे थे।

कुत्ते की कूं-कूं से उनकी तंद्रा टूटी तो बोले ''अरे बेटा तुम! कहो कैसे आए? घर पर सब लोग मज़े में हैं?'' ऐसा लगा कि उन्हें उत्तर में कोई रुचि नहीं है। प्रश्न पूछना था सो पूछ लिया। यह तो कुछ वैसा ही व्यवहार था जैसा कि विपक्ष का संसद में होता है। ''जी... वो ज़रा... आपको कुछ दिखाने लाया था। कुछ कविताएँ लिखी हैं, हमने सोचा आपको दिखा लें।''
''दिखाओ'', अचानक गंभीर हो गई उनकी मुखमुद्रा से गंभीर स्वर निकला। एक पल को तो हमें लगा कि कहीं कविताओं को लेकर हमने उनके कॉपीराइट को तो चुनौती नहीं दे दी। ख़ैर हमने पन्ने उनके सामने सरका दिए। उन्होंने अपनी ऐनक नाक पर चढ़ाई और काफ़ी देर तक अपनी थूक लगी उँगलियों से पन्ने पलट-पलट कर ध्यानमग्न होकर पढ़ने के बाद उन्होंने एक लंबी जम्हाई ली और उसी दौरान बोलते हुए कहा ''बाकी सब तो ठीक है पर तुम्हारी कविताओं में जीवंतता नहीं है।''
''जी...,'' हम बस इतना ही कह पाए थे कि पंडितजी बीच में ही टोकते हुए कहने लगे, ''अरे भाई कहाँ तुम नगरपालिका और समाज के चक्करों में उलझे हुए हो। अभी तुम लड़के हो कुछ रूमानियत पैदा करो अपनी कविता में। इतनी गंभीरता उस उम्र में अच्छी नहीं।''

इस बार हमने प्रश्नवाचक मुद्रा बनाई और बोलना चाहा पर पंडित जी तो अपने आप ही में खोए हुए थे, भला हमारी तरफ़ क्यों देखते। उन्होंने बोलना जारी रखा, ''शृंगार रस के बारे में पढ़ा है?'' उनके प्रश्न में प्रश्न कम शायद आश्चर्य अधिक था। पंडित जी का बोलना फिर शुरू हो चुका था, ''यही तो समस्या है आजकल के छात्रों और शिक्षा की, कि जो सीखते हैं उसका उपयोग नहीं करते और जिसका उपयोग करते हैं पता नहीं कहाँ से सीखकर आते हैं। हम लोग तो अपने विद्यालयों में ऐसी शिक्षा देते नहीं।''

कुछ सीखने की बात जब आई है तो हम आपको यह बात बता दें कि हमारे अध्यापक भी हैरान हो जाते थे हमारी परीक्षा पुस्तिकाओं को देखकर कि लड़कों ने जो कुछ भी लिखा है आख़िर सीखा कहाँ से। उनकी समस्या का भी निदान हो ही जाता, यदि हर परीक्षा पुस्तिका में विद्यालय के नाम के साथ-साथ सीखने की जगह के बारे में भी लिखा जाता। कुछ भोंदू किस्म के लड़कों को छोड़कर बाकी के सारे उस जगह में 'कन्या पाठशाला' ही लिखते।

हमारे गाँव में तीन स्कूल थे। पहला 'प्राथमिक विद्यालय' जो कि मुख्यत: लड़कों के लिए था, दूसरा ‘कन्या पाठशाला’ जो सिर्फ़ लड़कियों के लिए था और तीसरा ‘मांटेसरी स्कूल’ जो कि पास के शहर के हर मोहल्ले में कुकुरमुत्तों की तरह उगने के बाद हमारे गाँव में भी उगा आया था। मांटेसरी स्कूल में लड़कों और लड़कियों में किसी तरह का भेद नहीं था।

पहले दो विद्यालय चूंकि सरकारी थे इसलिए अब बंद हो चुके हैं यद्यपि आज भी हर साल छात्र­पंजिका में लड़कों के नाम दर्ज होते हैं पर वो खुशकिस्मत छात्र विद्यालय आने की बजाय अध्यापकों के खेतों में काम करके देश की उत्पादकता बढ़ाते हैं। रही बात कन्या पाठशाला की, तो अभिभावकों ने अपनी लड़कियों को पाठशाला भेजना ही बंद कर दिया। उनका तर्क था कि विद्यालय आकर अध्यापिकाओं के स्वेटर बुनने से अच्छा है कि घर पर रहकर घरवालों के ही स्वेटर बुने जाएँ।

तो इस तरह से दोनों सरकारी विद्यालय बंद हो गए। अब सारे गाँव को साक्षर बनाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से मांटेसरी स्कूल पर ही आ चुकी है। पंडित जी भी प्राथमिक विद्यालय की उपस्थिति पंजिका में उपस्थिति लगा कर मांटेसरी स्कूल में बच्चों को हिंदी पढ़ाते हैं। पता नहीं वो सीखने सिखाने की बात अपने पर भी लागू कर रहे थे या नहीं वैसे भी हम सोच में पड़ चुके थे 'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास...' वाला हाल हो चुका था। आए थे अपनी कविताओं का मूल्यांकन करवाने और अब शिक्षा पद्धति पर विचार सुनने को मिल रहे थे, हाय री विडंबना।

हमारा मन तो हुआ कि कह दें कि आप लोग तो विद्यालय में कैसी भी शिक्षा नहीं देते, पर चुप रहें और पंडितजी को सुनते रहे। नाक पर नीचे सरकते चश्मे को अपनी तर्जनी से ऊपर सरकाते हुए वो कहने लगे ''शिक्षा से अनुशासन तो अब ग़ायब ही है। भौतिक अनुशासन से लेकर वैचारिक अनुशासन, सब कुछ ग़ायब है, सब कुछ... शिक्षा से ही क्यों अब तो...।''

न जाने क्या सोच कर पंडित जी चुप हो गए, वैसे भी पता नहीं पंडित जी किस वैचारिक अनुशासन की बात कर रहे थे। हमारे विचार तो हमारे सामने कटी पतंग की तरह तैरते नज़र आ रहे थे, पता नहीं पंडित जी को भी दिख रहे थे या नहीं। अचानक अंदर से ढिशुम­ढिशुम की आवाज़ आई। हमने दरवाज़े की तरफ़ देखा और पंडित जी ने अपने कुत्ते की तरफ़, जो कि पहले से ही दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था, देखते हुए कहा, ''लल्लन टेलीविजन धीरे करो।''

हमें काफ़ी इत्मीनान हुआ यह जानकर कि यह टीवी था। वैसे भी जब से टीवी घरों में आया है, यथार्थ और कल्पनाओं में अंतर काफ़ी कम हुआ है। बच्चे तो सुपरमैन बन कल्पना की उड़ान भर कर जब यथार्थ की कठोर ज़मीन पर क्रैश लैंडिग करते हैं, माँ­बाप को सीधे अस्पताल ही भागना पड़ता है। गाँव का बनिया जब से एक डिश ख़रीदकर लाया है लगभग हर घर में केबल कनेक्शन पहुँच गया है। पाठकगण सोच में पड़ गए होंगे कि हम किसी बाइसवीं सदी के गाँव की बात कर रहे हैं क्योंकि हमारे देश के गाँवों में बिजली का तो भरोसेमंद कनेक्शन है नहीं और हम केबल कनेक्शन की बात कर रहे हैं।

हमारा गाँव इस मामले में थोड़ा प्रगतिवादी है, हालाँकि प्रगतिवादी होना मजबूरी है फिर भी है। बात यह है कि हमारा गाँव शहर के काफ़ी पास है। शहर साल दर साल फैल रहे हैं, इस बात से हमारा गाँव भी अछूता नहीं रहा और अब सांस्कृतिक क्राइसिस के मुहाने पर आ पहुँचा है। ख़ैर, देर सबेर यह तो होना ही था। अचानक हमारी तंद्रा पंडित जी के बड़बड़ाने से टूटी। ''सारे दिन टेलीविजन पर नंगनाच आता रहता है, बच्चे लोग हैं कि मानते ही नहीं हैं और ऊपर से ससुर ये रामपाल बनिया केबिल दिखा दिखा के सब सत्यानाश किए दे रहा है।'' बड़बड़ाना उनकी बेबसी थी। शायद वो अपने घर में ही किसी तरह के अनुशासन का ही पालन नहीं करवा पा रहे थे। घर क्यों उनके खुद के लिए भी यह कार्य काफ़ी दुष्कर था।

हम सभी की यही व्यथा है। जैसे हर बुराई पड़ोसी के घर से शुरू होती उसी प्रकार समाजसेवा भी। आपको राह चलते कितने ही ऐसे समाज सेवी मिल जाएँगे जिनके खुद के घर वाले उचक्कई करते घूम रहे होंगे। उदाहरण के लिए हमारे नेतागण जो अपना घर छोड़कर देश का नेतृत्व करने निकले हैं, भाई घर तो नातेदार सँभाल ही लेंगे पर देश को कौन सँभालेगा। सही कहा आपने, महानुभाव! वैसे भी सारी धरती तो हमारा घर है ही, 'वसुधैव कुटुंबकम'।

''हाँ तो बात शृंगार रस पर अटकी थी,'' पंडित जी गला खखारकर प्रसंग में वापस आते हुए बोले, ''देखो मैं तुम्हे एक उदाहरण देता हूँ,'' पर उदाहरण देने से पहले उन्होंने लल्लन को चाय के लिए आवाज़ लगाई। फिर उन्होंने चार पंक्तियाँ सुनाई, जिन्हें हम यहाँ लिख कर उन्हें अमरत्व नहीं प्रदान करना चाहते। ''यह है कविता हमने लिखी थी जब हम रहे होंगे कोई तुम्हारी उम्र के, जब हमारी शादी लल्लन की अम्मा से हुई थी और आज का दिन है, हमारे अंदर आज भी उतनी ही रूमानियत विद्यमान है।'' इसके साथ ही पंडित जी, पान चबा-चबा कर भूरे पड़ चुके अपने दाँतों को निपोर कर, हँस दिए। ख़ैर, कविता और चाय दोनों की ही मधुरता, बमुश्किल हमारे गले के नीचे उतरे। जब हमने उनसे चलने की आज्ञा माँगी, तो उनकी मुखमुद्रा देखकर ऐसा लगा कि हमने कोई अवज्ञा कर डाली है, एक बार फिर वो अपनी हिदायत दोहराना नहीं भूले, ''देखो लिखते तो ठीक हो पर थोड़ी-सी रूमानियत लाकर प्रयास करो।'' ख़ैर यह और बात है कि हमने पंडित जी की बात कभी नहीं मानी।

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तो यह था हमारे साहित्यिक व्यक्तित्व का समाज से प्रथम परिचय। अब चूंकि प्रथम था इसलिए काफ़ी झटकेदार अनुभव भी, आज तक याद है। बाकी के सारे तो कलम की स्याही बन काग़ज़ के पन्नों पर उतरे और समय के साथ फीके पड़ कर कहीं गुम हो गए। आज साहित्य के जिस पड़ाव पर हम आकर रुके हुए हैं, इसका सफ़र न जाने कितने टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर पूरा किया है। काफ़ी टेढ़ी-मेढ़ी बातें हैं, यदि चिंतन करने और लिखने बैठ गया तो हमारे साथ-साथ पाठकों को भी दर्शनशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि मिल जाएगी। वैसे भी न जाने अभी कितना सफ़र और बाकी है। मौका मिला तो बाकी के सफ़र की कहानी फिर कभी पर इस बेताल कथा को भूलिएगा

Friday, June 1, 2007

प्रेम शंकर रघुवंशी

जन्म : 7 जनवरी 1936 को बैंगनिया (सतपुड़ांचल के एक देहात) में।

प्रकाशित रचनाएँ-
कविता संग्रह: आकार लेती यात्राएं, पहाड़ों के बीच, देखो सांप : तक्षक नाग, तुम पूरी पृथ्वी हो कविता, पकी फसल के बीच, नर्मदा की लहरों से।
गीत-नवगीत-जनवादी गीत संग्रह अंजुरी भर घाम, मुक्ति के शंख, सतपुड़ा के शिखरों से।
कथा-लघुकथा संग्रह वह गन्ध, प्रश्न
बाल साहित्य- फुल्लो की गुड़िया, भारत की अस्र्णाई, पांच पेड़।
संपादित ग्रन्थ भवानी भाई (भवानी प्रसाद मिश्र पर)
समीक्षा कृति नवगीत : स्वरूप विश्लेषण (११७० तक)

पुरस्कार दुष्यंत पुरस्कार, बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार, आर्यकल्प पुरस्कार
सम्प्रति : हरदा के शासकीय महाविद्यालय से सेवामुक्त होकर यहीं सृजनरत।


माँ की याद

जब भी
पास पड़ोस मोहल्ले में
धोए जाते कपड़े
माँजे जाते पात्र
लीपे जाते मकान
दी जाती
'दूधो नहाओ पूतो फलो' की दुआएँ
मुझे माँ की याद आती
कि तभी
घर से आँगन तक
बह पड़ती नदी
जिसमें नहाकर मिट जाती
जन्म जन्मांतर की थकान।

ममत्व से दूर

बछड़ा दूध पीता
तब तक ही पहचानता माँ को

रँभाते वक़्त भी
यही ध्वनि निकलती कंठ से उसके

बड़ा होते बढ़ने लगते
माथे पर सींग

ममत्व से जो भी दूर जाता
पशुत्व के क़रीब होता
जहाँ पूरी दुनिया ही उसे
अपनी चरागाह लगती है।

डॉ सोनाली नरगुंदे

डॉ सोनाली नरगुंदे

व्याख्याता, पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से शिक्षाप्राप्त

तुम्हारा प्रेम

सभी हर्फ मेरी
किताबों के धुँधले
हो चुके है,
उनमें अब सिर्फ़
तुम्हारी यादों के
फूल महकते हैं।

सब कुछ छूकर भी
कुछ है अनछुआ,
वहीं अनछुआ, अनकहा
है तुम्हारा प्यार मेरे लिए।

कही अनकही बातों
में जो भी रहेगा
शेष वहीं होगा
अंतहीन प्रेम का विशेष।

एक ही मेज़ होगी
एक ही कुर्सी
अलग-अलग नहीं होगी
सोच हमारी
हम साथ में प्यार बाँटेंगे।

मेरे दिल के समंदर में
उतरने के बाद भी
वह डूबता नहीं
क्योंकि वह तैरना जानता है
और मैं नहीं।

दोपहरी की उमस
बंद पंखे को देखती
चार आँखें,
एक गलीचा
खुबसूरत बेल-बूटों
की कहानी में
दो दिमाग़
महसूस करते हैं
सिर्फ़ देह गंध
शब्दों को अभाव
भावनाएँ तैर रही हैं
श्वास बनकर

जीवन की मधुरतम स्मृतियों में
सहेजा मन का उल्लास हो
स्वर्णिम अतीत का
विस्तृत आकाश हो
नव जीवन की कल्पना से भरपूर
एक विचार मात्र
मेरे प्रतिछाया हो तुम

चुनकर लाए थे एक फूल
वो लौटाना चाहती थी
किसी ने दिया था शायद तुम्हें
जो भूल से मेरे पास छोड़ गए थे,
इस एक बहाने से
तुम्हारे पास आना चाहता थी।

गाँव का कुआँ

बरसों बाद आज
आज गाँव जाना हुआ
रास्ते भर बचपन की यादें
आंखों के आगे लहराती रही
वो पीपल का पेड़
जिसकी छाया में दोस्तों संग
पिट्ठू खेला करता था
वो कुआँ जिसका मीठा पानी
पी कर जवान हुआ
वो तालाब में भैंसों को नहलाना
नसूडे के पेड़ पर चढ़
नसूडे तोड़ कर लाना
नसूडे के रस से
पतंग बनाना, पेचें लड़ाना
इन्हीं यादों में खोया गाँव पहुँचा
तो मन उदास हो गया
तालाब के पानी से बदबू आ रही थी
न पीपल का पेड़ रहा न नसूडे का पेड़
न ही रहा वो कुआँ
वहाँ पर एक फास्ट-फूड कॉर्नर
बन गया है!
वहाँ कुछ देर रुक कर
पेप्सी पीते हुए
कुएँ के पानी की वो मिठास
याद आ गई
जिसके आगे यह पेप्सी
फीकी-सी लगी!

By- Umashankar

Shri Atal ji ki kavitayen

Meri Ekyavan Kavitayein
Anubhuti ke Swar